क़तर नरेश ने अपनी इटली यात्रा के दौरान सऊदी अरब पर अपने देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाया है और सऊदी अरब के हस्तक्षेप को बंद किये जाने को फार्स खाड़ी की सहकारिता परिषद के साथ मतभेदों के समाधान का एकमात्र मार्ग बताया है।
कतर, संयुक्त अरब इमारात और बहरैन जैसे देशों के खिलाफ सऊदी अरब से अपनी विदेश नीति के स्वतंत्र होने पर बल देता है जबकि सऊदी अरब फार्स खाड़ी के दूसरे देशों के संबंध में स्वयं को बड़े भाई की दृष्टि से देखता है और इन देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है।
यही नहीं वह न केवल दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है बल्कि उसे बुरा भी नहीं समझता है। दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप पर आधारित सऊदी अरब की नीति ही क़तर के साथ तनाव उत्पन्न होने और जून 2017 में उसके साथ संबंध विच्छेद का कारण बनी।
सऊदी अरब का अनुसरण करते हुए बहरैन और संयुक्त अरब इमारात ने भी कतर से अपने संबंधों को तोड़ लिया।
रोचक बिन्दु यह है कि यह तनाव सऊदी अरब के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। क्योंकि वह फार्स खाड़ी के अरब देशों के मार्गदर्शन का दावा करता है जबकि सऊदी अरब से अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता की कतर की घोषणा से रियाज़ को भारी आघात लगा।
यही नहीं कतर ने सऊदी अरब के मुकाबले में जो स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई है वह दूसरे अरब देशों के लिए प्रेरणा का आदर्श हो सकती है जैसाकि कुवैत ने भी इसी प्रकार की किसी सीमा तक स्वतंत्र नीति अपनाई है।
सऊदी अरब और क़तर के संबंधों में जो तनाव उत्पन्न हुआ है उसका पूरा लाभ क़तर को मिला। कतर ने अपने क्रिया- कलापों से सिद्ध कर दिया कि वह स्वतंत्र विदेश नीति के मामले में सऊदी अरब से कोई समझौता नहीं करेगा चाहे उसे रियाज़ और उसके घटकों की ओर से प्रतिबंधों का सामना ही क्यों न करना पड़े।